भारत, पर्वों और परंपराओं का देश, जहाँ हर उत्सव एक गहरी दार्शनिक समझ को छिपाए हुए है। इन सब में एक ऐसा पर्व है, जो आडंबर से दूर, पूर्णतः प्रकृति को समर्पित है – वह है छठ पूजा। इसे केवल एक त्योहार कहना इसकी महत्ता को कम आंकना होगा; यह तो जीवन-शक्ति, आत्म-नियंत्रण और शुद्धिकरण का चार दिवसीय महाव्रत है।
मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों से उपजा यह पर्व आज अपनी शुद्धता और कठिन तपस्या के कारण वैश्विक पहचान बना चुका है। दिवाली के ठीक छह दिन बाद, कार्तिक शुक्ल षष्ठी को, यह पर्व आरंभ होता है। यह उस सूर्य देव को नमन करने का अवसर है, जिनके बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना भी असंभव है। आइए, इस लोक आस्था के अप्रतिम पर्व की जड़ें टटोलें और इसकी अनूठी विशेषताओं को समझें।
Chhath Puja क्यों मनाया जाता है: तीन अनूठे आधार
छठ पर्व के पीछे छिपे कारण इसे बाकी त्योहारों से अलग बनाते हैं। यहाँ तीन प्रमुख कारण दिए गए हैं जो इसकी अनूठी महत्ता को स्थापित करते हैं:
1. जीवनदाता सूर्य देव के प्रति परम कृतज्ञता
यह पर्व सीधे तौर पर सूर्य देव (भगवान भास्कर) की आराधना का पर्व है। सनातन धर्म में सूर्य को एकमात्र प्रत्यक्ष देवता माना जाता है। छठ के माध्यम से व्रती सूर्य की ऊर्जा, स्वास्थ्य और जीवनदायिनी किरणों के लिए आभार व्यक्त करते हैं।
- आरोग्यता का वरदान: सूर्य को आरोग्य का देवता माना गया है। व्रती अपने परिवार को रोगों से मुक्ति और दीर्घायु का वरदान माँगते हैं।
- तेज और बल की प्राप्ति: सूर्य की उपासना से व्यक्ति के भीतर आत्मिक तेज और बल का संचार होता है।
- उगते और डूबते सूर्य की वंदना: यह छठ पर्व की सबसे अद्भुत विशेषता है। यह दर्शन सिखाता है कि जीवन में हर चरण (उत्थान और पतन) समान रूप से महत्वपूर्ण और वंदनीय है। डूबते सूर्य को अर्घ्य देना इस बात का प्रतीक है कि व्रती हर परिस्थिति में, यहाँ तक कि संकटकाल में भी, ईश्वर की शक्ति पर भरोसा रखते हैं।
2. छठी मैया: संतान और रक्षा की अधिष्ठात्री देवी
सूर्य के साथ, छठ में छठी मैया की पूजा होती है। छठी मैया को षष्ठी देवी (प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न) या देवसेना भी कहा जाता है।
- संतान सुख की प्राप्ति: यह पर्व विशेष रूप से निःसंतान दंपत्तियों के लिए वरदान माना जाता है। संतान की कामना पूरी होने पर या संतान की कुशलता के लिए माताएं यह व्रत रखती हैं।
- बालक की संरक्षिका: पौराणिक मान्यता है कि छठी मैया नवजात शिशुओं की रक्षा करती हैं और उनके भाग्य का निर्धारण करती हैं। इसलिए उनकी पूजा बच्चों के स्वास्थ्य, दीर्घायु और उज्जवल भविष्य के लिए की जाती है।
3. वैज्ञानिक और यौगिक साधना का संगम
Chhath Puja केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक पर्व भी है, जो वैदिक काल की यौगिक पद्धतियों पर आधारित है।
- शरीर का शुद्धिकरण (डिटॉक्सिफिकेशन): चार दिवसीय कठोर व्रत, विशेषकर 36 घंटे का निर्जला उपवास, शरीर को डिटॉक्स (विषमुक्त) करता है।
- विटामिन डी का अवशोषण: कार्तिक माह में सूर्य की किरणें सबसे सौम्य और उपयोगी होती हैं। नदियों के जल में खड़े होकर अर्घ्य देने से शरीर को सूर्य की ऊर्जा और विटामिन डी अधिकतम मात्रा में प्राप्त होती है, जिससे रोगों से लड़ने की शक्ति (इम्यूनिटी) बढ़ती है।
- प्राण शक्ति का जागरण: जल में खड़े होकर सूर्य को देखना और ध्यान करना, योग साधना की एक क्रिया है, जो शरीर के चक्रों को जाग्रत करती है और प्राण शक्ति को बढ़ाती है।
छठ पर्व का गौरवशाली इतिहास और पौराणिक आख्यान
छठ पर्व का इतिहास त्रेता युग से द्वापर युग तक फैला हुआ है, जो इसकी प्राचीनता और महत्ता को दर्शाता है।
1. त्रेता युग: मर्यादा पुरुषोत्तम का आदर्श
लोक कथाओं के अनुसार, रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद, जब भगवान राम अयोध्या लौटे, तो राज्याभिषेक से पूर्व उन्होंने और माता सीता ने स्वयं को शुद्ध करने के लिए सूर्य षष्ठी का कठोर व्रत किया। मुंगेर के सीता चरण मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि माता सीता ने यहीं पर यह व्रत किया था। राम-सीता द्वारा स्थापित यह परंपरा बाद में लोक आस्था का केंद्र बन गई।
2. द्वापर युग: पांडवों का राजपाट वापस दिलाने वाला व्रत
महाभारत काल में इस पर्व का महत्व एक अलग रूप में उभरता है:
सूर्यपुत्र कर्ण की उपासना: महान धनुर्धर कर्ण, जिन्हें सूर्य देव का पुत्र माना जाता है, प्रतिदिन सुबह नदी में खड़े होकर अपने पिता सूर्य को अर्घ्य देते थे। यह पद्धति आज भी Chhath Puja का अभिन्न अंग है।
द्रौपदी का संकल्प: जब पांडवों को जुए में अपना राजपाट खोना पड़ा और वे वनवास झेल रहे थे, तब द्रौपदी ने महर्षि धौम्य के कहने पर सूर्य देव की आराधना की। इस व्रत के फल से पांडवों को न केवल अपने दुखों से मुक्ति मिली, बल्कि उन्हें पुनः अपना राज्य, वैभव और सम्मान भी प्राप्त हुआ।
3. राजा प्रियंवद और षष्ठी देवी की उत्पत्ति
एक प्राचीन कथा षष्ठी देवी (छठी मैया) की उत्पत्ति से संबंधित है। राजा प्रियंवद निःसंतान थे। ऋषि कश्यप के यज्ञ से प्राप्त खीर खाने पर रानी मालिनी ने एक मृत पुत्र को जन्म दिया। राजा जब पुत्र को लेकर अंतिम संस्कार के लिए जा रहे थे, तब आकाश से षष्ठी देवी प्रकट हुईं। उन्होंने कहा कि वह ब्रह्मा की मानस पुत्री और सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं। उन्होंने राजा को विधिवत छठ व्रत करने का आदेश दिया। देवी के कहे अनुसार व्रत करने पर राजा का मृत पुत्र जीवित हो गया। यह कथा संतान प्राप्ति और शिशु कल्याण के लिए छठी मैया की पूजा के महत्व को स्थापित करती है।
चार दिवसीय महाव्रत: संयम और शुद्धता की पराकाष्ठा
Chhath Puja का हर दिन संयम और पवित्रता के कठोर नियमों से बंधा होता है। व्रत की यह संरचना मन, वचन और कर्म की शुद्धि सुनिश्चित करती है।
दिवस 1: नहाय-खाय (शुद्धिकरण का आरंभ)
- शुद्धि स्नान: व्रती नदी या जलाशय में पवित्र स्नान करते हैं। यह शारीरिक शुद्धता का प्रथम चरण है।
- सात्विक भोजन: इस दिन कद्दू-भात (लौकी की सब्जी और चावल) और चने की दाल का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। भोजन की तैयारी में शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। यह भोजन ही व्रत की कठोर यात्रा के लिए शरीर को तैयार करता है।
दिवस 2: खरना या लोहंडा (आत्म-नियंत्रण की पहली अग्नि)
- दिनभर का उपवास: व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं।
- संध्या का प्रसाद: शाम को सूर्य की पूजा के बाद, गुड़ या गन्ने के रस से बनी खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
- 36 घंटे के महाव्रत का सूत्रपात: खरना का प्रसाद खाने के साथ ही व्रती का 36 घंटे का सबसे कठोर निर्जला (पानी रहित) उपवास शुरू हो जाता है, जो अगले दो दिन चलेगा।
दिवस 3: संध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य को प्रणाम)
- डूबते सूर्य की वंदना: व्रती पूरे परिवार के साथ नदी या तालाब के घाट पर जाते हैं। यह पर्व का सबसे भावनात्मक क्षण होता है।
- दउरा (बांस की टोकरी) में प्रसाद: ठेकुआ, चावल के लड्डू (कसार), मौसमी फल (केला, गन्ना) और अन्य पकवानों से सजी टोकरियाँ सूर्य देव को अर्पित की जाती हैं।
- जल में अर्घ्य: व्रती जल में खड़े होकर दूध और जल से भरे पात्र से अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देते हैं। यह कर्म इस बात का प्रतीक है कि जीवन के हर चरण में सूर्य की शक्ति और आशीर्वाद आवश्यक है।
दिवस 4: उषा अर्घ्य और पारण (नवजीवन का उदय)
- प्रभात की प्रतीक्षा: रातभर छठ गीत गाते हुए, व्रती सुबह सूर्योदय से पहले ही घाट पर पहुँच जाते हैं।
- उगते सूर्य को अर्घ्य: भोर होते ही, उगते हुए सूर्य की प्रथम किरण को अर्घ्य दिया जाता है। यह अर्घ्य जीवन में आशा, नई शुरुआत और ऊर्जा के संचार का प्रतीक है।
- पारण (व्रत तोड़ना): उषा अर्घ्य के बाद, व्रती छठी मैया को चढ़ाए गए प्रसाद, विशेषकर अदरक और गुड़, को खाकर अपना 36 घंटे का कठिन व्रत पूर्ण करते हैं। इसके बाद प्रसाद का वितरण होता है।
Chhath Puja: एक सामाजिक समरसता का प्रतीक
छठ पर्व का सामाजिक पहलू इसे अन्य त्योहारों से विशिष्ट बनाता है:
- सामूहिकता का भाव: घाटों की सफाई से लेकर प्रसाद बनाने तक, यह पर्व सामूहिक सहयोग से मनाया जाता है। बिना किसी भेद-भाव के, समाज के सभी वर्ग एक साथ पूजा करते हैं, जो सामाजिक समरसता का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- पारंपरिक कला और संस्कृति: छठ पर्व के दौरान गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत (जैसे – ‘केलवा के पात पर उगलें सुरूज देव’) भोजपुरी, मैथिली और मगही संस्कृति की अनमोल धरोहर हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती हैं।
- प्रकृति संरक्षण: यह त्योहार हमें प्राकृतिक संसाधनों, विशेषकर नदी और जल निकायों की पवित्रता बनाए रखने का स्पष्ट संदेश देता है।
निष्कर्ष: भारतीयता की आत्मा का प्रतिबिंब
Chhath Puja केवल सूर्य की उपासना नहीं है; यह एक गहन आध्यात्मिक प्रक्रिया है जो व्यक्ति को सादगी, शुद्धता, धैर्य और प्रकृति के प्रति सम्मान के शिखर पर ले जाती है। यह पर्व सिखाता है कि महानतम शक्ति (सूर्य) को प्राप्त करने का मार्ग कठोर तपस्या और आत्म-नियंत्रण से होकर गुजरता है।
आज जब पूरी दुनिया स्वास्थ्य और पर्यावरण के संकट से जूझ रही है, तब छठ पर्व का यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है कि जीवन का मूल स्रोत प्रकृति है, और उसकी वंदना ही हमारे अस्तित्व का आधार है। यही कारण है कि यह लोक आस्था का महापर्व आज भी करोड़ों लोगों की रगों में उसी श्रद्धा और भक्ति के साथ दौड़ता है, जैसा वैदिक काल में दौड़ता था।
आप सभी के जीवन में छठी मैया और सूर्य देव का आशीर्वाद बना रहे। छठ महापर्व की हार्दिक बधाई!
छठ पर्व को सबसे कठिन क्यों कहा जाता है?
36 घंटे के निर्जला (जल रहित) उपवास, पवित्रता के अत्यंत कठोर नियमों और जल में घंटों खड़े रहकर पूजा करने की कठिन तपस्या के कारण इसे सबसे कठिन व्रत माना जाता है।
छठ पूजा में किन फलों का विशेष महत्व है?
इस पूजा में गन्ना (ईख), केला, नारियल, और ‘डाभ’ नींबू जैसे मौसमी फलों का विशेष महत्व होता है, जो प्रकृति की ताज़गी और प्रचुरता के प्रतीक हैं।
छठी मैया कौन हैं और उन्हें किसकी बहन माना जाता है?
छठी मैया (देवी षष्ठी) संतान और कल्याण की देवी हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, उन्हें सूर्य देव की बहन और ब्रह्मा जी की मानस पुत्री (देवसेना) माना जाता है।
पारण कैसे किया जाता है?
अंतिम दिन, उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद, व्रती घाट पर छठी मैया को चढ़ाए गए प्रसाद, विशेषकर कच्चे दूध, जल और कुछ फलों को खाकर अपना व्रत पूर्ण करते हैं।
सूर्य को अर्घ्य देने का वैज्ञानिक लाभ क्या है?
जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने से सुबह की कोमल सूर्य किरणें शरीर को विटामिन डी और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती हैं, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक शक्ति बढ़ती है।